ठीक नहीं हालात

                     1
जबसे रुपया गिर रहा, ठीक नहीं हालात।
मंहगाई भी बढ़ रही, निर्धन पर आघात।।
निर्धन पर आघात, विदेशी हमें डराते।
करते रोज विवाद, नूतन टेक्स लगाते।।
बिगड़ी सारी सोच, माफ है कर्जा तबसे।
सोना हुआ है तेज, कायदे बिगड़े जबसे।।
                      2
मुफ्त राशन मिल गया,फोकट हुआ इलाज।
सोच बनी है आलसी, विकृत हुआ समाज ।।
विकृत हुआ समाज, रहा नहि भाई-चारा।
ठीक नहीं हालात, पंगु अब देश हमारा ।।
कहते कवि, बेढंग, देश में चलता शासन।
सोये पैर पसार, खा कर मुफ्त का राशन।।
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          कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 

जीवन का आधार

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जीवन मिलना सरल नही है,मिले नहीं हर बार।
दीनों की सेवा करना ही, जीवन का आधार।।
धन संचय की क्षुधा मिटाकर,करना है उपकार।
सभी जीव में समता देखें,जीवन का आधार।।
रटो नहीं तुम माया माया, माया है बटमार।
माया से तो तन सुख मिलता,बनते हैं बदकार।।
जीवन का आधार सरलता, नित्य करें सहकार।
रोटी,वस्त्र,भवन बिन साथी,जीवन भी बेकार।।
पंच तत्व जीवों में होते,लिप्सा,क्षुधा विकार।
सबसे सच्ची प्रेम भावना, जीवन का आधार।।
आज वक्त की मांग यही है,और कई हकदार। 
जीवों की सेवा करना ही,जीवन का आधार।।
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   कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 28/10/25

दे-दे मुझको ज्ञान शारदे




दे दे मुझको ज्ञान शारदे, दे दे मुझको ज्ञान।
मैं हूं याचक तेरे मठ का, रखना मेरा ध्यान।।

स्वेत हंस की करो सवारी,बीणा रखतीं हाथ,
मेरे मन में आन विराजो, करदो मुझे सनाथ,
संत हमेशा कहते आए, देती हरदम साथ।
पढ़-लिखकर मैं बनूं सिपाही,रखूं देश की शान…१

अंतर मेरा उजला कर दे, जैसा तेरा चीर,
धूमिल पानी मैं धरती का, करदे निर्मल नीर,
कृपा अगर तेरी हो जाए, मंत्र बोलता कीर,
तेरा यश संतों ने गाया, मिला जगत में मान….२

मांं बच्चों को अंक लगा ले,कर दे कर की छांव,
आगे आगे चलता जाऊं, रखूं ना पीछे पांव,
पालक बनकर करूं बिजाई, हरा भरा हो गांव,
भारत की माटी में गूंजे, युगों-युगों तक गान….३

श्वेत कमल सिंहासन तेरा, सब जीवों में वास,
पल-पल तेरी ओर निहारूं, है तुमसे ही आस,
ऐसा हमको पाठ पढ़ा दो,मिटे तमस का त्रास,
कंठ संभालो आकर माता, छेड़ सुरीली तान…4
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      कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 
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रोजगार की आशा

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मेहनत करके पढ़ते थे हम,रोजगार की आशा में।
जितने आगे बढ़ते जाते, उतने पड़े निराशा में।
शिक्षा पूरी हुई हमारी, सत्ता गिरी फरेबी में…
आज भटकते हैं दर दर में, बूढ़े हुए हताशा में।।
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         कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 

छात्र-मोबाइल

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मां मुझको मोबाइल दे दे, ऐक सबक सुलझाना है।
डाउनलोड करूंगा उसको,उसके प्रिंट कराना है।
सभी विषयों के हल पेपर हैं, इम्तिहान में आयेंगे… 
देख वीडियो मुझे समझना, कक्षा में रोब जमाना है।।
ऑनलाइन कक्षा है मेरी, गूगल मीट चलाना है।
मां मुझको मोबाइल दे दे, मुझे हाजिरी देना है।।
फिर भी डैटा बचा रहा तो,थोड़ी रील चला लेना…
बटनों बाला आप चलाओ, करना नहीं बहाना है। 
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         कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 

पतंग

                      पतंग 
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उत्तर को दिनमान हुए हैं,सरपट चले तुरंग।
पादप भी खिलने को होते,कलरव करें विहंग।।
कलियों ने भी घूंघट खोला,मिटने लगे बिरंग।
बदल रहा धरती पर मौसम,मन में भरी उमंग।।
आसमान भी खिला खिला है,बहती पवन उतंग।
मेरा मन भी झूमे गाये, पड़े थाप मृदंग।।
तिल के लड्डू गजक मिठाई,खा कर हुआ मतंग।
आज उड़ाने चला हाथ में, ले कर नई पतंग।।
बनी टोलियां दो दो की तो, पत्नी मेरे संग।
कनकैयों से व्योम ढका है, दिखता हैं बहुरंग।।
मकर संक्रांति पर्व निराला,लगता खूब सरंग।
बीहू, पोंगल,मकर, लोहड़ी, है पर एक प्रसंग।।
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       कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 

मैया उर में भरो चेतना

          
               हर हर नर्मदे
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मैया उर में भरो चेतना, छूटे जग का फेरा।
अपनी ममता की आभा से, हर ले तमस घनेरा।

मैया रेवा रुद्र नंदनी, शरण तिहारी आए।
तेरी ममता बड़ी निराली, संतों ने बतलाए ।।
कल कल बहती तेरी धारा,मोहक तान सुनाए।
डम डम डमरू की नादो से,तट पर होत सबेरा..
मैया उर में भरो चेतना….
छूटे जग का फेरा।।1

तेरे निर्मल जल से माता, दुनिया प्यास बुझाए।
कंकर भी शंकर हो जाते, तेरे नीर डुबाए।।
अमरकंट से आकर तूने, हमको दरश दिखाए।
मठ मठ में हो आप विराजीं, नित्य लगातीं फेरा..
मैया उर में भरो चेतना….
छूटे जग का फेरा।।2

कोप किया ना तूने माता, तट पर नगर बसाए।
हरदम उनकी रक्षा करतीं, जिसने गुण हैं गाए।।
सौम्य रूप की छवि निराली,लाल ध्वजा लहराए।
घाट घाट पर संयासी भी, डाले अपना डेरा..
मैया उर में भरो चेतना…
छूटे जग का फेरा।।3

मिल जाए आंचल की छाया,जड़ चेतन हो जाए।
कल कल में संगीत समाया,मन मोहित हो गाए।
हर हर बोलें नाम साथ में, कलयुग नहीं सताए।।
कदम कदम पर भक्तों ने भी, तेरे तट को घेरा..
मैया उर में भरो चेतना…
छूटे जग का फेरा।।4

लाल रंग के लंहगा चूनर, तेरे मन को भाए।
मधुर मधुर हंसती हो मैया, मूरत बहुत सुहाए।
ग्राह सवारी करके माता, धाम धाम को जाए।।
सब भक्तो पर कृपा करके, करती दूर अंधेरा..
मैया उर में भरो चेतना,
छूटे जग का फेरा।।5

मैला मन भी धुल जाता है, जो भी नीर नहाए।
तेरे तट के दर्शन ने ही, सारे ताप हटाए।।
तेरे जल से मातु नर्मदा, कोढ़ी कोढ़ मिटाए।
मेरी बारी कब आयेगी, काहे करत अबेरा..
मैया उर में भरो चेतना,
छूटे जग का फेरा।
तेरी ममता की आभा से, 
हर ले तमस घनेरा।।6
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🙏मां नर्मदा जी की जयंती 2026
    भजन हरि गीतिका छंद 
        कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 
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मंजिल सबकी एक

           मंजिल सबकी एक 
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भोर भये में आए हैं और, शाम ढले को जाना।
सबकी मंजिल एक ठिकाना,क्या खोना क्या पाना।

चाहे कितने हाड़ खपा लो,करलो कपट कमाई।
अपनों से संबंध मिटा कर, उनसे रखो बुराई।
ये जग तो है रैन बसेरा, कुछ दिन यहां बिताना।
मंजिल सबकी एक बटोही,मरघट सही ठिकाना।
सबकी मंजिल एक ठिकाना,क्या खोना क्या पाना...1

धरी रहेगी तेरी माया, देह पड़ी रह जाती।
जितने दिन का रोगन डाला,जलती उतनी बाती।
जीवों में क्यों भेद दिखाए, फेरा सबका आना ।
मंजिल सबकी एक कवीरा, फिर काहे इतराना।
सबकी मंजिल एक ठिकाना,क्या खोना क्या पाना...2

सबमें इक ही राम बसा है,उड़ता वही अकेला।
आग लगे तक सब रोते हैं,मिटता सभी झमेला।
सबकी मंजिल एक देहरी, वहां हाजरी देना।
कोई सिफारिश नहिं चलेगी,ना है देना लेना।
सबकी मंजिल एक ठिकाना,क्या खोना क्या पाना...3
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        कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 

कुत्ती चीज

 😛कुत्ती चीज 😛
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मैं भी बहुत बड़ी कुत्ती चीज हूं,
सीधी नहीं थोड़ी सी टेड़ी खीर हूं……

तुम्हारे जैसे दिल के फकीरों को,
अपने को दो बार बिकवा चुका हूं,
अपने इसी शहर के अमीरों को,
फिर भी लौट कर आ गया हूं,
अपनी पत्नी के पल्लू की छांव में,
बड़ा सुकून मिलता है इस दाव में……
मैं भी बहुत बड़ी कुत्ती चीज हूं,
सीधी नहीं थोड़ी सी टेड़ी खीर हूं।।1
आज भी उतना ही हरा भरा हूं,
तुम्हारे सामने फिर भी खड़ा हूं,
तुम्हारे जैसे बूढ़े मेरे खेल रहे,
दो चार तो झूले पर झूल रहे,
पांव उनके ऐसे फूल रहे,
मिन्नते मुझसे मांग रहे,
फिर भी मैं घूम रहा हूं इस चाव में, 
फंस जाए कोई फिर मेरे इस दाव में…
मैं भी बहुत बड़ी कुत्ती चीज हूं,
सीधी नहीं थोड़ी सी टेड़ी खीर हूं।।२
कई बार हो गये क्रिया करम मेरे,
तब भी छोड़ा नहीं कार्यक्रम मेरे,
रोज रोज नए नए मुर्गे तलाशता हूं,
एक माह पहले से ही फांसता हूं,
चुगाता हूं मोतियों के दाने,
तभी तो आते हैं गर्दन फंसाने,
ताकता रहता हूं हर शहर हर गांव में,
कुछ तो तैयार है आने को मेरे ठांव में…….
मैं भी बहुत बड़ी कुत्ती चीज हूं,
सीधी नहीं थोड़ी सी टेड़ी खीर हूं।।३
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मौलिक रचना:-कमलेश नागवंशी बनखेड़ी

स्वर्ण छुए आकाश

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स्वर्ण छुए आकाश जब, पैसा गिरता दाम।
धनिक भरें गुदाम और,मुख ताके आवाम।।
स्वर्ण छुए आकाश तब, गुप्त होय व्यापार।
धनिक बढ़ाते कोष निज, दीन रहें लाचार।।
दीनों के वश में नहीं, स्वर्ण छुए आकाश।
नकली जेवर बन रहे, लूट रहे बदमाश।।
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        कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 

ताव दिखाती ठंडी

                गीतिका मुक्त 

                       (1)

जबसे महिना लगा पूस का,अपना ताव दिखाती ठंडी।

हरे घास पर शबनम बनकर, मुझको बहुत सुहाती ठंडी।।

रोज अलाव तापते रहते, किस्से रोज सुनाती ठंडी।।

उगती हैं सूरज की किरणें, तब थोड़ा शरमाती ठंडी।।

                        (2)

आमाशय में आग लगी हो,उनको नहीं सताती ठंडी।।

बीच नर्मदा नरियल पकड़े,उनसे है घबड़ाती ठंडी।।

हाट के हम्माल को देखो, उसको तो सहलाती ठंडी।।

खेतों में जो करें मजूरी, उन पर चंवर डुलाती ठंडी।

                         (3)

जिनको होती पैसों की गर्मी,उनको बहुत छकाती ठंडी।

मफलर बंद कोट पेंट में, मोजे में घुस जाती ठंडी।

हीटर गीजर हवा बंद है, तो भी खूब गलाती ठंडी।

नरमा नरम गद्दों को ही,अपना ताव दिखाती ठंडी,

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          कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 


त्रस्त है अमीर से


      🙏 मनहरण घनाक्षरी 🙏 
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नींद से है लथपथ, धूप में भी मदमस्त,
तन में जो श्रमवारि, इसे ना जगाइए।
नहीं मांस हाड़ पर, सो रहा है खाट पर,
घोर गरीब वेश में, इसे ना सताइए
त्रस्त है अमीर से, किसान मेरे देश का,
सताया हुआ कर्ज का,आप ही विचारिए।
हाथ इसके आस है, खूब करे विकास है,
श्रम से तो थका नहीं, इसे तो बचाइए।
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    कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 

घोर गरीबी

छाया नहीं नसीब में, नहीं बदन पर टाट।
हुआ थकन से चूर तो, सोया टूटी खाट।।
सोया टूटी खाट, हाड़ का पिंजर दिखता।
दो पैसे की आस, भूख से दिन भर लड़ता।।
दुर्बल होती गात, दिखाए नंगी काया ।
हाय गरीबी घोर, सिर पर नहीं है छाया।।
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    कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 
                    (1)
घोर गरीबी लड़ रही, कौन जितावन हार।
सिर पर गट्ठर आज भी, उस पर हुआ उभार।।
उस पर हुआ उभार, दर्द तो बहुत सताता।
रहता मन को मार, किसी को कहां बताता।।
किससे करे गुहार, नहिं है कोई करीबी।
होत कहां उद्धार, पड़ा जो घोर गरीबी।।
                    (2)
जनता निपुण जहां नहीं, होते लोग गरीब।
शोषण से बचते नहीं, लिखते धनी नसीब।।
लिखते धनी नसीब, बिगारी खूब कराते।
हरदम लेते काम, कभी ना दाम चुकाते।।
शोषण होता रोज, कोई कहां है सुनता।
किससे करें गुहार, समझ ना पाये जनता।।
                    (3)
खूब अमीरी कर रही, मानवता पर बार।
घोर गरीबी देख कर, देते सब दुत्कार।।
देते सब दुत्कार, मिले ना उसे सहारा।
करते हरदम काम, कहाते सदा नकारा।।
देते अगर जवाब, यातना मिले शरीरी।
शोषण को तैयार, हमेशा खूब अमीरी।।
                   (4)
रहता बेतुक कायदा, सत्ता धनिकों पास।
शोषण से बचते नहीं, मिले सदा ही त्रास।।
मिले सदा ही त्रास, गरीबी घोर सताती।
जीने को मजबूर, रोटियां बहुत नचाती।।
कहता कवि बेढंग, फरेबी उनको छलता।
बेड़ा जाता गर्क, नियम जब ढीला रहता।।
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    कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 


कर दो बंद खदान