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फिर से बचपन लौट के आता,वही पुरानी दुनिया,
घने पेड़ की छाया होती,वही पुरानी खटिया, खूब खेलता उस पर चढ़कर,खींच बहिन की चुटिया,
फिर से बचपन लौट के आता,वही खेल की कुटिया......
वही पुराने साथी होते, वही पुराने कपड़े,
बिन नाड़े की चड्डी होती, उसे हाथ से पकड़े,
फिर से बचपन लौट के आता, जाएं चराने बछड़े....
वो चने की एक रोटी होती, आम करी की चटनी,
दूध भरा वो गिलसा होता, और पुरानी मथनी,
फिर से बचपन लौट के आता, वही पुरानी करनी...
शीतल जल की नदिया होती, उसमें छोटी मोरी,
बांस बनी पिचकारी होती, और कीचड़ की होरी,
फिर से बचपन लौट के आता, वही पुरानी लोरी.......
वही पुराना बचपन होता, जिसमें संगी-साथी,
पत्तों के वे सच्चे पैसे होते, लड़ते गुत्थम-गुत्थी,
फिर से बचपन लौट के आता, वही पुरानी थाती.......
बाड़े भीतर करके चोरी, करें बराबर हिस्सा,
नीचे छानी अलाव बना लूं, सुनूं परी के किस्सा,
फिर से बचपन लौट के आता, वही पुराना गुस्सा,
फिर से बचपन लौट के आता. वही पुरानी दुनिया.....
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मेरी स्वरचित कविता:-कमलेश नागवंशी बनखेड़ी
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