कक्का हैं बौराने

             कक्का हैं बौराने

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सावन भादों सूख गए थे, बैसाखों में हरियाने।
बड़ी अनोखी काया उनकी,वे सदा फिरें बौराने।
कक्का से अब दद्दा लगते, जब आधे हुए सयाने।
अबतक उनको मिली नार ना, वे ता से हैं गरमाने...
कक्का से अब दद्दा लगते, जब आधे हुए सयाने…1
जब जब आये उन्हें देखने, जो सुंदर लड़की वाले।
माॅंगें उनकी बड़ी बड़ी थीं, वो कमियां बहुत निकालें।
जग जाहिर हो गये क्षेत्र में, फिर पीछे पड़े बुलाने...
कक्का से अब दद्दा लगते, जब आधे हुए सयाने…2
खूब घूमते उनके पीछे, जिनकी है लड़की देखी।
उल्टा उनको लालच देते, अब नहीं बघारें शेखी।
कितने जोड़ी जूते घिसते,सब मुॅंह से लगे बताने...
कक्का से अब दद्दा लगते, जब आधे हुए सयाने…3
उनने अब तक आस न छोड़ी, फिर घर की करी पुताई।
पौष निकलते बात चलाते,अब शायद मिले लुगाई।
रोज बुलाते वे ना आते, लगते उन्हें गरियाने...
कक्का से अब दद्दा लगते, जब आधे हुए सयाने…4
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       कुंकुम छंद:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी  

 

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

सुंदर कविता

कर दो बंद खदान