पूस की इस भोर में,है ओस हर कोर में,(1)
घास बिछी कुटीर में, मड़ैया है फूंस की।
रखी हांड अलाव में,बथुआ नहीं भाग्य में,
ललन बैठे पास में, लगी आग भूख की।
हड्डियों के ढांच में, बुभुक्षा बड़े पेट में,
मटके से उदर में, बनी रेख राख की।
कुल्हड़ है साथ में, बैठ गये है पास में,
संजोए हुए चित्त में,आस अब साग की।
(2)यौवन के वक्त में, सामर्थ्य नहीं गात में,
चौधरियों के खेत में, बंधुआ प्रवीर है।
संगनी यह साथ में, काम करें मुफ्त में,
मिले न दाम हाथ में, कैसी तकदीर है।
अकेल अरु भीर में, रहती फटे चीर में,
सदा वदन पीर में, ये कैसी तस्वीर है।
है ठंडक प्रवात में, जमी ओस पात में,
सिंचाई करे रात में, कांपता शरीर है।
(3)
कोट पेंट पहन कर,अरु शाल ओढ़कर,
चौधरी हुंकार कर, लेत खेत हाजरी।
कहे ललकार कर, ना काबू जुवान पर,
संपुट को जोड़कर, सुना रहे शायरी।
खड़े पांव गाड़कर, दोऊ हाथ जोड़कर,
हमें क्षमा दान कर, भूल हुई आखरी।
चला मन मारकर, संगनी पुकार कर,
डरी भूख हारकर, मिले नहीं रावरी।
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घनाक्षरी:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹
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