ऐसी मेरी माता

               ऐंसी मेरी माता
                        *
बचपन में जैंसी देखा था, वैंसी आज भी माता,
नया रंग और देख दिखावा, उसको नहीं सुहाता।…
सुबह सबेरे उठ जाती,  रोज पीसने गेंहू, 
पानी लेने कुआं को जाती, करती गलियन झाड़ू,
चौंका, चूल्हा रोज पोतती, सारे कपड़े धोती,
जब तक सोता रहता......
थकती मैंने कभी न देखा, ऐंसी मेरी माता,......1
घी, गुड़ में एक रोटी देती, बड़े मजे से खाता, 
बड़ी बड़ी थीं दूध मथानी, उसमें दहीं बिलोती,
दो अक्षर की पढ़ी लिखी, सुंदर ढ़िगें लगाती,
मैं भी संग लगाता......
कभी न देखा उसको चिढ़ते, ऐसी मेरी माता…..2
पूरे गांव घड़ी नहीं थी, फिर भी पता है होता,
पाजामे का बस्ता होता,उसमें पुस्तक रखती,
पल्लू से वो पैसे देती, पंजी हो या दस्सी,
मैं खुशियां रोज मनाता....
मना करते कभी न देखा, ऐसी मेरी माता…..3
तन से वो रही हारती, फिर भी मन मुस्काता,
बच्चों को पास बिठाकर, मेरे किस्से कहती,
उनकी नानी की बातें, उनको रोज सुनाती,
सुन कर मैं भी हंसता.... 
बच्चे हंसते वो हंसतीं,ऐसी मेरी माता…..4
                   *********   
मेरी रचना -कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

Good

कर दो बंद खदान