मेरा विकास
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जंगलों में घूमते हुए,पैर जलते थे।
झुरमुट के कांटे,पैर में चुभते थे।
पहले पत्तों को,पांव में लपेटा गया।
तनों के तंतुओं से,बांधा गया।
दौड़ने में, भागने में,फट जाता था।
घिस घिस कर,बिखर जाता था।
एक हुनरमंद ने, चमड़ा लपेट कर।
गर्मी और ठंड में, खूब देखा दौड़ कर।
धीरे-धीरे आकार में,आने लगा संसार में,
समय बीतता गया,ढलता गया आकार में,
पहले घरों के बाहर, मुझे उतारा गया।
अछूत मानकर, मुझे दुत्कारा गया।
जमाना बदला है, मैंने सम्मान पाया है,
गुजरे जमानों से,सीख पाया है।
आज किचन में, बेधड़क घुस गया हूं,
खुल्लम खुल्ला,निर्भय घूम रहा हूं।
मेरा मान बढ़ गया है,सभाओं में उछल रहा हूं,
लात घूसों की जगह,मैं काम आ रहा हूं।
हां, मैं पैरों का जूता,किसी से नहीं अछूता हूं।
मेरा भी इतिहास है,मेरा भी विकास है।
कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी