मैं जूता हूं

 मैं जूता, 
मेरा आविष्कार 
 मेरा विकास 
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जंगलों में घूमते हुए,पैर जलते थे।
झुरमुट के कांटे,पैर में चुभते थे।
पहले पत्तों को,पांव में लपेटा गया।
तनों के तंतुओं से,बांधा गया।
दौड़ने में, भागने में,फट जाता था।
घिस घिस कर,बिखर जाता था।
एक हुनरमंद ने, चमड़ा लपेट कर।
गर्मी और ठंड में, खूब देखा दौड़ कर।
धीरे-धीरे आकार में,आने लगा संसार में,
समय बीतता गया,ढलता गया आकार में,
पहले घरों के बाहर, मुझे उतारा गया।
अछूत मानकर, मुझे दुत्कारा गया।
जमाना बदला है, मैंने सम्मान पाया है,
गुजरे जमानों से,सीख पाया है।
आज किचन में, बेधड़क घुस गया हूं,
खुल्लम खुल्ला,निर्भय घूम रहा हूं।
मेरा मान बढ़ गया है,सभाओं में उछल रहा हूं,
लात घूसों की जगह,मैं काम आ रहा हूं।
हां, मैं पैरों का जूता,किसी से नहीं अछूता हूं।
मेरा भी इतिहास है,मेरा भी विकास है।
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कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी

बिन मौसम बरसात


        बिन मौसम बरसात 
      दिनांक:- 30/10/2025
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बिन मौसम बरसात से, बिगड़ गए हालात।।
नहीं मावठा जानिए, बरसे जो दिन रात।
बरसे जो दिन रात, खेत में बखर न जावें।
काटे नहिं है धान, उसे अब कहां छुपावें।।
उजड़े कवि के खेत, बरखा के जलपात से।
होता है नुकसान, बिन मौसम बरसात से।।
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ऐसा पानी गिर रहा, गिरा न भादों मास।
बदल रहा पर्यावरण, होता है आभास।।
होता है आभास, सभी हैं मौसम बदले।
बिन मौसम बरसात,करम है तेरे पिछले।।
बढ़े गगन में ताप, समझ ना ऐसा वैसा।
धरती करे सुधार, गिरा कर पानी ऐसा।।
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राहें तो सूखी नहीं, खेत खड़ी है धान।
बिन मौसम बरसात से, चिंतित हुए किसान।।
चिंतित हुए किसान, रुकी है फसल बुवाई।
थम जाएं बरसात, तभी हो खेत जुताई।।
हलधर करें उपास, मिटे ना किस्मत लेखी।
होती है बरसात, मिले नहिं रोटी सूखी।।
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फसल उगाई जतन से,बहा पसीना खूब।
एक जरा सी भूल से,गई तपस्या डूब।।
गई तपस्या डूब, बिजूका नहीं लगाये। 
नहीं बनाई बाड़,जानवर कहां भगाये।।
सूना छोड़ा खेत, रुग्णता बहुत सताई।
सारी हुई बेकार,जतन से फसल उगाई।।
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✍️:- कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 30/10/25


कोई जोर

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चला न कोई जोर तो, झूठा करें विरोध।
अपनी अपनी चाल से,खड़े करें अवरोध।।
खड़े करें अवरोध, काम ना करने देते।
करते उल्टे काम, नहीं वो जिम्मा लेते ।।
नियम रखे हैं ताक, जनता सभी है सोई।
उठे अगर आवाज, सुनता उसे ना कोई।।
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                         2
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बच्चों सा कौतुक करें, खूब उड़ाने मौज।
चला न कोई जोर तो, नई बनाते फौज।।
नई बनाते फौज, खूब है भीड़ जुटाई।
अपनी जाते भूल, विपक्ष की करें बुराई।।
रखते मन में भेद,काम करें नहिं सच्चों सा।
सदा रखे गुमराह, मेल नहिं है बच्चों सा।।
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          कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 

छीना झपटी वंदगी

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छीना झपटी हो रही, जिसे मिला वो शेर।

छोड़ा जिसने हाथ से, लेते गीदड़ घेर।।

सबको रखते हासिए,कौन रहे हकदार।

छीना झपटी चल रही,किसकी हो सरकार।। 

नहीं सुहाती दिल्लगी, हृदय बहुत कमजोर।

प्रेम करे पर टूटता, जहां किया पुरजोर।।

करूं वंदगी दूर से, टूटे दिल के तार।

गहरे घाव कुरेदते, और छिड़कते क्षार।।

दिल्लगी और वंदगी, अद्भुत करती मार।

राम राम है दूर की, छोड़ मजाकी नार।।

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  ✍️:- कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी

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फसल उगाई जतन से,बहा पसीना खूब।

एक जरा सी भूल से,गई तपस्या डूब।।

गई तपस्या डूब, बिजूका नहीं लगाये। 

नहीं बनाई बाड़,जानवर कहां भगाये।।

सूना छोड़ा खेत, रुग्णता बहुत सताई।

सारी हुई बेकार,जतन से फसल उगाई।।

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आज देश की शान में, लगे हैं चारों चांद।

मान बढ़ाने बेटियां, गईं टाॅस को फांद।।

आज बेटियां जीत गईं, सोना भरी सुगंध।

मान बढ़ाने बेटियां, खाईं थीं सौगंध।।

अपनी तूती बोलती, विश्व पटल पर आज।

हरमनप्रीत कौर का, अच्छा था आगाज।।

युगों-युगों से छोरियां, रखें देश का मान।

हिंद देश की नारियां, होती बहुत महान।।

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     ✍️:-कमलेश नागवंशी बनखेड़ी

आदत से मजबूर

आदत से मजबूर
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बिच्छू जैसे डंक को, रखते अपने पास।
मौका पाकर मारते, देते जग को त्रास।।
कागा जैसी मति रखें, विषधर जैसे दांत।
अजगर जैसी चाल से, सबको देते मात।।
पाठ पढ़ें उपकार के, फिर भी कोसों दूर।
मौका पाते घात करें, आदत से मजबूर ।।
जिसमें करते भोज है, पत्तल देते छेद।
आदत से मजबूर हैं, नहीं मनाते खेद।।
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स्वरचित:-कमलेश नागवंशी बनखेड़ी 

मेरी यह कविता भी पढ़ेंः-सावन की बौछारः-

सावन की बौछार

          
           सावन की बौछार
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पर्वत नदियां जंगल धरती,सावन की बौछार।
बादल उतरे आंगन मेरे,निर्मल बहे बियार।।
नदियां नारे ताल भरे हैं, पानी बहे कछार।
जैसे जैसे आगे बढ़ता, देता धरती फार।
झरझर झरझर पत्ते बोले, निर्झर बहती धार।

जब जब झोंके चलें हवा के, मस्ती करे बयार।
धरती लागे छनी छनी सी,   धुली धुली सी गैल।
हरियाली है हरी भरी सी, ठिठुरे ठिठुरे बैल।
थौड़ी थौड़ी गिरे फुहारें, 
सावन लगता छैल।
खड़े ठूंठ भी मुस्काते हैं, नई निकलती कैल।

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        कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 

चुल्लू भर पानी


चुल्लू भर पानी 
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अपना मान बढ़ाने को, 
दूजा लज्जित होने को।
उठा कफ़न से ढांक रहा, 
अपने खोटे कर्मो को।
धरती दफ़न करेगी ना, 
सागर उन्हें डुबाये ना,
चुल्लू भर जल को छोड़ो,
अनल उन्हें जलाये ना।
शर्म हया को भूल गया, 
मात पिता की डुबो गया,
दाम नहीं है बातों का,
निजी हैसियत भूल गया।
डरता नहीं कमीनी से,
चुल्लू भर वो पानी से,
कोई उसका क्या बिगाड़े,
डरे न नाक कटाई से।
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कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 

बात नहीं पहले जैसी

               
 बात नहीं पहले जैसी 
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पहले जैसी बात नहि, नहीं रही वो प्रीत।
पता नहीं किस बात पर,दूर हुए हो मीत।।
दूर हुए हो मीत, आज कल रूठे रहते ।
अपने मन की बात,नहीं तुम हमसे कहते।।
कविरा कहे विचार, बात नहिं ऐसी वैसी।
बढ़ा कुटुंबी भार, बात नहीं पहले जैसी।।
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   कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 
                      

थोड़ी सी मोहब्बत


  
     थोड़ी सी मोहब्बत
                    000
खनकते शब्दों से इल्जाम हम पर ना लगाते,
आपके ग़म में हमें इतना ना तड़पाते।। 
अगर थोड़ी सी मोहब्बत दिल में जो होती।
नाम ले लेकर हम भी आंसू ना  बहाते,
चूर थे आपकी मोहब्बत के नशे में,
क्या पता हमसे कोई भूल हो गई।
इस कदर छाया था नशा हमें,
शायद उसी की हमें खुमारी हो गई।
ना आते दिल में हमारे हमें मोहब्बत ना होती..
बहुत रोता है दिल हमारा याद में,
अब आंखों से आंसू निकलते नहीं,
बुझने लगे हैं अरमान तुम्हारे बिना,
आ लौट कर आओ दामन में सही,
ना भरमाते मासूमियत से,मोहब्बत ना होती..
मेरे मासूम अरमानों से खेलकर,
चले गए, मुड़कर देखा तक नहीं।
कैसे जिंदा है इश्क की गफलतों में,
आ जाओ दिल को जलाने ही सही,
ना करते मोहब्बत तो इतनी गलफत ना होती..
अब तो सहारा नहीं गमों के सिवा,
तन्हाई में सूरत दिखती है आपकी,
हम भी मिटाने को जख्म यादों के,
कुरेदने लगे जख्म, यादों में आपकी,
ना करते मोहब्बत तो इतनी फजीहत ना होती..

                    *00*
👉यह भी पढ़ेंः- संत भरा भगत चालीसा👈
                       सुबह पूछते खेम👈
रचना:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 

साॅंसों का संकट


          साॅंसों का संकट 
                       1
खूब खुदाई हो रही,कटते पर्वत पेड़।
साॅंसों का संकट बढ़ा,रहे धरा को छेड़।।
रहे धरा को छेड़,रोकड़ा बहुत कमाते।
बूढ़े बच्चे ज्वान, दवाई रोज चबाते।।
उड़े गगन में धूल,सभी की नाक समाई।
बंद करो ये काम, नही हो खूब खुदाई।।
                       2
जली पराली खेत की, घुसी शहर मैंदान।
साॅंसों का संकट बढ़ा, करें लोग ऐलान।।
करें लोग ऐलान, उद्योग अमिय उगलते।
अल्कोहल का तेल,यान जो रोज गटकते।।
तुक्कड़ मारे तुक्क, फेंकते गप्प निराली ।
कलंकित कृषक लोग,और है जली पराली 
                      3
बढ़ती धन की लालसा,मिटी खेत की मेंड़।
सांसों का संकट बढ़ा, काटे जब ये पेड़।।
काटे जब ये पेड़, बड़ा उद्योग लगाया ।
बढ़ी बहुत जब धुंध, पराली दोष बताया।।
करें बनाना बंद, नहीं जो पन्नी सड़ती। 
नहीं जतन से जांच, यहीं से आफ़त बढ़ती।।
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     रचना:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 

अपनों के ही बीच

                 कुंडलियाँ
                      1
घर की घर में ही रहे, अपनों के ही बीच।
सारा जगत हॅंसी करे,उड़ती है जब कीच।।
उड़ती है जब कीच, उजागर होती कमियां।
ढकी हुई हो बात, जैसे नई दुल्हनियां।
नहीं बताओ भेद, खुले जो राहें डर की।
 छोड़ो ऐसी रार, बचाओ इज्जत घर की।।
                    2 
संकट में भी होते नहिं,आपस में संवाद।  
अपनों के ही बीच में, होते रहे विवाद।।
होते रहे विवाद, क्षीण बल से हो जाते।
गैरों पर विश्वास, उनको बलिष्ट बनाते ।।
छोड़ो ऐसी रार,पड़ो नहिं तुम झंझट में।
देखो तुम परिवार,पड़े घर नहि संकट में।।
             **00**
    रचना -कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹

एक आत्मा, एक वर्ग

       एक आत्मा, एक वर्ग 
               जीव चौरासी लाख योनियों में जन्म लेता है। किंतु जो आत्मा जिस योनि में जन्म लेती है वह हमेशा एक ही योनि में जन्म लेती है उसकी योनि में बदलाव नहीं होता। यह मिथ्या है कि मनुष्य या अन्य जीवों को बारी-बारी से अलग-अलग योनियों में जन्म लेना पड़ता है। जीवों के चार वर्ग होते हैं 1-अण्डज 2-पिण्डज 3-स्वेदज 4- उद्भिज ।
               क्या कभी अंड से पिंड जन्म ले सकता है या नहीं। पक्षी गर्भ से, स्वेदज उद्भिज में जन्म नहीं लेते हैं। अण्डा से पक्षी,गर्भ से मनुष्यादि, पसीने से सूक्ष्म जीव और पृथ्वी से उ्शद्भिज ही होंगे। जो आत्मा जिस प्रकार की योनि के लिए होती है उसी में जन्म भी लेती है।हाथी के शुक्र से हाथी ही पैदा होता है और पेड़ से पेड़।
              आपने एक बात पर ध्यान दिया होगा कि जानवर बिना प्रशिक्षण के पूरा ज्ञान रखता है। यह ज्ञान उसके पूर्व जन्म का संग्रह होता है। 
             कभी आपने सोचा है कि जो जीव जिस शरीर या योनि में जन्म लेता है वह वैसा ही व्यवहार करने लगता है। किस चारे को खाना है या नहीं। कब प्रजनन करना है,कब कौन सा आहार लेना है। आपने देखा होगा कुत्ते को घास खाते हुए,‌ शेर भी घास खाता है। क्या जानवरों में कोई जानवर डाक्टर होता है? नहीं। मगर वह जानता है कि मुझे अपच है घास खाने से पेट का भोजन बाहर आयेगा, पेट खाली हो जायेगा।
             मनुष्य पूर्व जन्म के सभी क्रियाकलाप भूल जाता है परन्तु अन्य जीव नहीं भूलते। क्योंकि मनुष्य नये नये प्रयोग करता है।अपना विकास करता है।जब जन्म लेता है तब तक संसार में बदलाव हो चुका होता है।हमने पूर्व जन्म की कहानियां बहुत से लोगों से सुनी हैं। हमारे पुराणों में भी वर्णन मिलता है। नल-नील, जय-विजय।
          कभी किसी जीव को मारा जाता है तब वह भागने की कोशिश करता है क्योंकि उसे उसके शरीर से लगाव होता है उसने बार-बार इसी शरीर में जन्म लिया है। वह यह क्यों नहीं सोचता कि इस शरीर के बाद मुझे मानव शरीर मिलेगा। उसे कैसे पता होता है कि मारने पर दर्द होता है।
           पेड़ के बीज को यह पता कैसे चलता है कि मुझे कब उगना है,कब फल देना है? हम मनुष्य कई प्रकार से नये नये काम सीखते हैं और कुछ अंतराल में भूल भी जाते हैं। इसी काम को अगर लंबे समय तक करते रहें तो हम भूलते भी नहीं और हमारी अंदरूनी शक्ति इसे याद कर लेती है हम बिना ध्यान, बिना देखे भी काम को करते जाते हैं।
          चौरासी लाख योनियां होती हैं, जितने प्रकार के जीव होते हैं। मगर आत्मा जिस शरीर के लिए होती हैं उसी में बार-बार जन्म लेती है। ये कैसे हो सकता है कि एक मनुष्य की आत्मा पेड़ के अंदर घुस जावे ? न पेड़ की आत्मा कीड़ों में घुसेगी। अगर ऐसा होता तो ये सिस्टम बिगड़ सकता था। जहां जो फिट होता है वही लगाया जाता है। 
          आत्मा के कार्य को उसके निर्देश को पूरा करने के लिए हमारा शरीर माध्यम बनता है। एक उदर से,दो शरीर पैदा होकर भी उनका व्यवहार समान नहीं होता। 
            अतः हम कह सकते हैं कि आत्मा प्रत्येक शरीर की वर्गीकृत होती है। अण्डज के लिए अण्डज, पिण्ड के लिए पिंडज, स्वेदज के लिए स्वेदज, उद्भिज के लिए उद्भिज।
          जीव ही योनियों में जन्म लेता है ना कि आत्मा, और योनियों को चौरासी लाख बताया गया है ये हो सकती है क्योंकि ब्रह्मांड में कितने प्रकार के जीव होते हैं। इन्हें ही चार भागों में बांटा गया है। बात आती है आत्मा की जब तक किसी शरीर में आत्मा नहीं होती वह जीव नहीं कहलाता। आत्मा शरीर से संबंध नहीं रखती तो आत्मा और शरीर के बीच का संबंध मतलब प्राण रूपी पुल टूट जाता है।
           बात है आत्मा की, जो एक शरीर से दूसरे शरीर में जन्म (पृविष्ट) होती है,अंडज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज में। इनकी आत्माएं भी अलग अलग होती हैं।
          आत्मा और जीव में जीवन में अंतर होता है।आत्मा के बिना जीव जन्म नहीं ले सकता न जीवन जी सकता है। आत्मा अमर है। सूक्ष्म है। अभौतिक है। कार्य आत्मा नहीं कराती, काम इंद्रियां कराती है, मन इन्द्रियों के वशीभूत होकर, कार्य करने के लिए भौतिकता की आवश्यकता होती है।जो किसी शरीर में प्रवेश करने के जीव के रूप में उत्पन्न होती है। 
           डी. एन. ए. पुत्र में पिता के होते हैं किन्तु दोनों के कर्म भिन्न हो सकते हैं। ऐसा क्यों होता है ?
         बात आती है आती है आत्मा की जो जन्म, मृत्यु से परे है किन्तु शरीर की प्राण शक्ति के द्वारा शरीर को क्रियाशील रखती हैं। 
        हम बात करते हैं, आत्मा की जो सिर्फ किसी एक शरीर के लिए होती हैं जैसे - अंडज,पिंडज, स्वेदज, उद्भिज इनकी सभी अलग-अलग आत्माएं होती हैं। आत्मा को मोटे तौर पर समझा जाये तो यह चुंबक है और लोहा शरीर दोनों के बीच जो आकर्षण बल है वह प्राण है।
       जीव,बिना आत्मा और शरीर के नहीं बनता। कहा जाता है कि आत्मा कर्मों के फल भोगती है। ऐसा नहीं है। अच्छा बुरा मन को लगता है,मन करवाता है,शरीर (भौतिक) भोगता है।
आत्मा स्वर्ग नरक कर्मों अनुसार भोगती है, जब वह अजर अमर है तो वह स्वर्ग नरक से भी परे है। स्वर्ग नरक तो शरीर भोगता है। जिस जीव-शरीर ने जहां जिस योनि में जन्म लिया है वह उसके लिए स्वर्ग है। कभी सोचा है गंदगी में जन्म लेने वाला प्राणी ये कहे कि मैं नरक भोग रहा हूं, मुझे मार कर मोक्ष दिला दें। नहीं, उसके लिए वही स्वर्ग है।
      आत्मा एक नहीं हो सकती। अगर आत्मा एक है तो दूसरे शरीर को कष्ट क्यों पहुंचाने का काम करती है। 
           परमात्मा  भी नहीं है। माया भी नहीं है। आत्मा निर्विकार, सचेतन है।
          एक शरीर में अनेकों आत्माएं निवास करतीं हैं। आप कहोगे कैसे?  जीने के लिए चाहिए, भोजन, पानी, आक्सीजन और यही सब क्रियाएं हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं में होती है। नई कोशिकाएं बनती है पुरानी मरती हैं। कोशिकाएं भोजन पानी भी लेती हैं। 
          डाॅक्टर हमारे शरीर का निकला हुआ बाल्टी में रखा दो दिन पुराना खून मरीज के शरीर में क्यों नहीं चढ़ाता ? क्योंकि यह मर चुका होता है खून का छोटा कण हमारी कोशिका होती है,कोशिका के मरने के कारण इसका उपयोग नहीं होता।यह हमारे शरीर के सभी अंगो पर लागू होता है। जो कोशिका जी होती है तो उसमें भी आत्मा रही होगी। इस प्रकार से हमारे शरीर में अनेकों आत्माएं निवास करती हैं।
          जो योनि होती है उसकी आत्मा भी उसी तरह से अनुकूलित होती है या कहें उसके लिए ही बनी होती, फिर वह पेड़,जानवर, मनुष्य, कीड़े मकोड़े में कैसे प्रवेश कर सकती है। 
   जब वह अच्छे-बुरे का ज्ञान रखती है।
                                                             *000*
                  लेख:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 

एक्सपायरी डेट

                  एक्सपायरी डेट 
                   (ताटंक छंद) 
एक्सपायरी क्यों नहीं है, सोचो मेरे भैया जी.....
एक्सपायरी कहां नहीं है,जरा बताऐं भैया जी....
जड़ी बूटियां नहीं अछूती, मॅडिसिन में भी भैया जी।
मानव जीवन साठ साल का, भारत में है भैया जी।
राजनीती के सिंहासन पर, क्यों नहीं है भैया जी..?
एक्सपायरी कहां नहीं है,जरा बताऐं भैया जी।....1
बीजा,पासपोर्ट, टिकट में,चालक परमिट भैया जी।
राशनकार्ड, बिजली बिल में,गाड़ी परमिट भैया जी।
मोबाइल के फ्री चार्ज में, भवनों में भी भैया जी।
वोटरों की आयु में बंधन, क्यों नहीं है भैया जी..?
एक्सपायरी कहां नहीं है,जरा बताऐं भैया जी।.....2
किराने में, वाहन में आयु, विस्फोटक में भैया जी।
पुल सड़क और ठेकों में भी,आय चुकाने भैया जी। 
और बहुत हैं एक्सपायरी, गिन लो मेरे भैया जी ।
नोटो पर ये क्यों नहीं है , आप बताऐं भैया जी..? 
एक्सपायरी कहां नहीं है,जरा बताऐं भैया जी।.....3
                  ******000*****
           रचना -कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 

बचपन लौट के आता


          फिर से बचपन लौट के आता
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फिर से बचपन लौट के आता,वही पुरानी दुनिया, 
घने पेड़ की छाया होती,वही पुरानी खटिया,  
खूब खेलता उस पर चढ़कर,खींच बहिन की चुटिया, 
फिर से बचपन लौट के आता,वही खेल की कुटिया......
वही पुराने साथी होते, वही पुराने कपड़े,
 बिन नाड़े की चड्डी होती, उसे हाथ से पकड़े,
फिर से बचपन लौट के आता, जाएं चराने बछड़े....
वो चने की एक रोटी होती, आम करी की चटनी,
दूध भरा वो गिलसा होता, और पुरानी मथनी,
फिर से बचपन लौट के आता, वही पुरानी करनी...
शीतल जल की नदिया होती, उसमें छोटी मोरी,
बांस बनी पिचकारी होती, और कीचड़ की होरी,
फिर से बचपन लौट के आता, वही पुरानी लोरी.......
वही पुराना बचपन होता, जिसमें संगी-साथी, 
पत्तों के वे सच्चे पैसे होते, लड़ते गुत्थम-गुत्थी,
फिर से बचपन लौट के आता, वही पुरानी थाती.......
बाड़े भीतर करके चोरी, करें बराबर हिस्सा,
नीचे छानी अलाव बना लूं, सुनूं परी के किस्सा,
 फिर से बचपन लौट के आता, वही पुराना गुस्सा,
फिर से बचपन लौट के आता. वही पुरानी दुनिया.....
                             000
  मेरी स्वरचित कविता:-कमलेश नागवंशी बनखेड़ी         

कामनी श्रृंगार

शशि मुख बिंदी सविता लागे,नैना काजल काला है।
लाल चूनरी ओढ़ कामनी, हार मोतियन डाला है।
हाथों उसके चूड़ी खनके, पायल की सुरतालो में
आस पास बो डोल रही है, गड़बड़ होने बाला है ।।
               -----000-----
            रचना -कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 
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ऐसी मेरी माता

               ऐंसी मेरी माता
                        *
बचपन में जैंसी देखा था, वैंसी आज भी माता,
नया रंग और देख दिखावा, उसको नहीं सुहाता।…
सुबह सबेरे उठ जाती,  रोज पीसने गेंहू, 
पानी लेने कुआं को जाती, करती गलियन झाड़ू,
चौंका, चूल्हा रोज पोतती, सारे कपड़े धोती,
जब तक सोता रहता......
थकती मैंने कभी न देखा, ऐंसी मेरी माता,......1
घी, गुड़ में एक रोटी देती, बड़े मजे से खाता, 
बड़ी बड़ी थीं दूध मथानी, उसमें दहीं बिलोती,
दो अक्षर की पढ़ी लिखी, सुंदर ढ़िगें लगाती,
मैं भी संग लगाता......
कभी न देखा उसको चिढ़ते, ऐसी मेरी माता…..2
पूरे गांव घड़ी नहीं थी, फिर भी पता है होता,
पाजामे का बस्ता होता,उसमें पुस्तक रखती,
पल्लू से वो पैसे देती, पंजी हो या दस्सी,
मैं खुशियां रोज मनाता....
मना करते कभी न देखा, ऐसी मेरी माता…..3
तन से वो रही हारती, फिर भी मन मुस्काता,
बच्चों को पास बिठाकर, मेरे किस्से कहती,
उनकी नानी की बातें, उनको रोज सुनाती,
सुन कर मैं भी हंसता.... 
बच्चे हंसते वो हंसतीं,ऐसी मेरी माता…..4
                   *********   
मेरी रचना -कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 

कक्का हैं बौराने

             कक्का हैं बौराने

           **000**

सावन भादों सूख गए थे, बैसाखों में हरियाने।
बड़ी अनोखी काया उनकी,वे सदा फिरें बौराने।
कक्का से अब दद्दा लगते, जब आधे हुए सयाने।
अबतक उनको मिली नार ना, वे ता से हैं गरमाने...
कक्का से अब दद्दा लगते, जब आधे हुए सयाने…1
जब जब आये उन्हें देखने, जो सुंदर लड़की वाले।
माॅंगें उनकी बड़ी बड़ी थीं, वो कमियां बहुत निकालें।
जग जाहिर हो गये क्षेत्र में, फिर पीछे पड़े बुलाने...
कक्का से अब दद्दा लगते, जब आधे हुए सयाने…2
खूब घूमते उनके पीछे, जिनकी है लड़की देखी।
उल्टा उनको लालच देते, अब नहीं बघारें शेखी।
कितने जोड़ी जूते घिसते,सब मुॅंह से लगे बताने...
कक्का से अब दद्दा लगते, जब आधे हुए सयाने…3
उनने अब तक आस न छोड़ी, फिर घर की करी पुताई।
पौष निकलते बात चलाते,अब शायद मिले लुगाई।
रोज बुलाते वे ना आते, लगते उन्हें गरियाने...
कक्का से अब दद्दा लगते, जब आधे हुए सयाने…4
                *****
       कुंकुम छंद:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी  

 

पूस की भोर

  (1)
पूस की इस भोर में,है ओस हर कोर में,
घास बिछी कुटीर में, मड़ैया है फूंस की। 
रखी हांड अलाव में,बथुआ नहीं भाग्य में,
ललन बैठे पास में, लगी आग भूख की।
हड्डियों के ढांच में,  बुभुक्षा बड़े  पेट में, 
मटके  से  उदर  में, बनी  रेख राख की।
कुल्हड़  है  साथ में, बैठ गये है पास  में,
संजोए हुए चित्त में,आस अब साग की।
                      (2)
यौवन के वक्त में, सामर्थ्य नहीं  गात  में,
चौधरियों  के खेत में,  बंधुआ प्रवीर है।
संगनी यह साथ में,  काम करें मुफ्त में,
मिले  न दाम हाथ में, कैसी तकदीर है।
अकेल अरु भीर में, रहती  फटे चीर में,
सदा वदन  पीर  में, ये कैसी तस्वीर  है।
है ठंडक प्रवात में, जमी  ओस  पात  में,
सिंचाई  करे रात  में, कांपता शरीर  है।                  
                      (3)
कोट पेंट पहन कर,अरु शाल ओढ़कर,
चौधरी  हुंकार  कर,  लेत  खेत  हाजरी।
कहे ललकार कर, ना  काबू जुवान  पर,
संपुट  को जोड़कर,  सुना  रहे  शायरी।
खड़े पांव गाड़कर, दोऊ  हाथ  जोड़कर,
हमें  क्षमा  दान कर, भूल  हुई  आखरी।
चला  मन  मारकर, संगनी पुकार कर,
डरी  भूख  हारकर, मिले  नहीं रावरी।
                     *****
घनाक्षरी:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 


कुछ तो करो विचार

                     छप्पय छंद 
                 कुछ तो करो विचार 
                         *****
धरती  वेवश  हुई, और  अब  है  पुकारती ।
नारी  नहीं  सुरक्षित, कहती  है  मां  भारती ।
कुछ  तो  करो   विचार,  कैसे   हो   उद्धार।
लुटती  कन्या  लाज, बिगड़े  मनुज  विचार।
भाई-भाई  में  मेल नहिं, ये  कैसे  इंसान है।
सकल सुविज्ञ सोचें कारण,क्यों इतने हैवान हैं। 
                         ””””
   🙏छप्पय छंद लिखने की कोशिश 🙏 
   कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 29/10/25

कुछ तो करो विचार

          कुछ तो करो विचार
                    000
कोई इज्जत मान नहि, कैसे हो उद्धार। 
नहीं सुरक्षित नारी है,कुछ तो करो विचार,।
क्या राज है यही  राम का, हरते गुण्डे लाज।
निर्बल आज तरस रहा, दाने दाने आज।।
सब तरफ बेकारी है, शिक्षित फिरें बेकार।
अगुवा सारे शकुनि है, कुछ तो करो विचार।।
धरती नदियां बिक रहीं, कानन हुए शिकार।
गगन पवन में बिष घुला, कुछ तो करो विचार 
                       000
  दोहे:कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 29/10/25


बिगड़े काम कराने को

                  बिगड़े काम कराने को
                              1
चुनकर भेजा अपने हित में, हमने ही वरदान दिया।
आप कोसते हो क्यों उसको,ऐसा क्या है काम किया।
उससे बिगड़े काम कराने, तुमने उसका चुना ठिया....
फिर कहते हो उसने हमसे,मन भरके उत्कोच लिया।
                              2
अडिग रहो तुम सच्चाई पर,नेकी के सब काम करो।
मन में होवे बैर अगर तो, उसका तुम तो दमन करो।
तजकर भेद पराया अपना, सबसे तुम तो प्रेम करो....
कुछ दिवसों का जीवन अपना, नहीं किसी से बैर करो।
                             ****
                    लावनी :-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 

दो शब्दों का गीत

             दो शब्दों का गीत  
                      ***
कवियों की पूजा करूं, शब्द सुमन ले हाथ।
सबको मैं वंदन करूं, और नवांऊ माथ ।।
और नवांऊ माथ, धुरंधर तुम्हें गुरुजी ।
देना तुम आशीष, करूं मैं छंद शुरू जी।।
दो शब्दों का गीत, गाते करूं मैं नर्तन।
देना मुझको ज्ञान, करूं कवियों का अर्चन।
                    ****
  स्वरचित:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 
मेरी यह कविता भी पढ़ेंः-बिगड़े काम कराने कोः-


तिरछी चितवन


               तिरछी चितवन
                     *****
                    ताटंक छंद 
तिरछी चितवन नयन कटीले,भोली नार चकोरी के।
आम नहीं ये खास मंजिमा,अंदाज निराले छौरी के।
चंचल नटखट वदन छरैरा,अधर खिले हैं फूलों से...
निरख रही है घूंघट पट से,सामे साजन गोरी के।।
                    ****
                 कुंडलियां छंद
                     ***
कजरा हो जो आंख में,कुमकुम लगे लिलार।
माथे जब बिंदी लगे, लाती और निखार।।
लाती और निखार, साथ में कुंडल दमके।
केश घटा के पार, दामिनी चमके जैसे।।
कामुक बहे बयार, देख कर यौवन गदरा।
सजना रहे निहार, ढलक ना जाए कजरा।।
                           ***
            स्वरचित:-कमलेश नागवंशी बनखेड़ी

मैं भी भूखा सखे

                            कृष्ण-सुदामा
श्याम  वर्ण  सुंदर  नयन, शोभा  होंठ  अपार। 
वंशी अधर  सुहावनी, तिलक  सजा  लिलार।।
मोर मुकुट सिर पर लगा, कुंडल झलके कान।
तिरछी चितवन देखकर, मोहित हुआ जहान।।
पीत वसन  को ओढ़कर, लकुटी लेकर हाथ। 
लकड़ी  लेने  वन  गये, सखा  सुदामा  साथ।।
काले   काले   बादरा,  बरसत  मूसल   धार।
ठिठुरन  बढ़ी  शरीर  में, चढ़े  पेड़  की  डार।।
चना  चबाते   देखकर,  बोले   श्री  भगवान।
मैं  भी  तो  भूखा सखे,  व्याकुल होते प्रान।।
सखा  मुझे  भी  चाहिए, भेजा  है  गुरु मात।
किटकिटा  रहे  शीत से,  मित्र बत्तीसों दांत।।
सारे   चने   बिखर  गए,  छूट  गई   है  गांठ।
पीताम्बर  जब  मेरा ,उलझ  गया था  सांठ।।
मन  ही  मन में दुख हुआ, खाया मेरा  भाग।
इसी  जनम में भोगना, लगा लिया  जो दाग।।
दरिद्र  सुदामा  हो  गए, कृष्ण   द्वारकाधीश।
पूरण किया उधार नहिं, नहिं मिलें जगदीश।
                    ****
      दोहे:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी


अच्छी बात नहीं

              अच्छी बात नहीं
       *******************
सड़कों पर गाय फिरे, चोटिल होते हैं राही।
अगर गाय को चोट लगे,दल के करें तबाही।
ये अच्छी बात नहीं…..
दल बाले गाय पालते,छोड़ें दूध निकाल।
बूढ़ी होने पर उसको,घर से देत निकाल।
ये अच्छी बात नहीं….
गौ सेवा की बात करें,देते बहु उपदेश।
चोरी छिपे उसे बेचते,धरकर रूप विशेष।
ये अच्छी बात नहीं……
डाॅग प्रेम में डूबकर,पालें कुत्ता एक।
सड़कों पर जो घूमते,उनसे करें परहेज।
ये अच्छी बात नहीं…..
भंडारे में दान करें,भूखी माता घर में।
घड़ी-घड़ी कपड़े बदलें,माता रहती चिथड़े में।
ये अच्छी बात नहीं……
और नार उर्वशी लगे,खुद की लगे चुड़ैल।
दुःख में सदा संगनी,दूसर भागी गैल।
ये अच्छी बात नहीं…..
तरो ताज़ा गरमा गरम,देखें देश के हाल।
तरसे मेहनत रोटी को,हैं कपटी मालामाल।
ये अच्छी बात नहीं….
दागी को कुर्सी मिले,हत्यारे को मान।
बीच बाजार में लुट रहा,कृषक, युवा,जवान।
ये अच्छी बात नहीं….
**********************
कविता:कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 

बाढ़

                बाढ़
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          पानी पानी हो रहा, मेरा सारा गांव।
कीचड़ सारी गैल में, बचा नहीं है ठांव।।
बचा नहीं है ठांव, गांव में फंसे गुरू जी।
कैसे काटे रात, नहीं है खाने भाजी।।
जिसके जाते द्वार, उसी की टपके छानी।
बाढ़ करे हैरान, नहीं जो घटता पानी।।
भूला नहिं मैं भूलकर, बरसाती वो साल।
बाढ़ अचानक आ गई, सारे हुए निढाल।। 
सारे हुए निढाल, गांव में पिटी मुनादी।
मैं भी उनमें एक, सभी भूले उस्तादी ।।
कविवर हुआ उदास, जलेगा कैसे चूला।
कैसे काटीं रात, आज तक मैं नहिं भूला।।
चौदह दिन पानी भरा, डेरा डाले गांव।
पेड़ सभी डूबे हुए, डूबे सभी पड़ाव।।
डूबे सभी पड़ाव, जानवर फिरते भूखे।
बिना साग के रोट, चबाये मैंने रूखे।।
उतर गई थी बाढ़, गिरने लगी थी छानी।
छोड़ा मैंने गांव, निरुद्ध हुआ जब पानी।।
                 ****
कविता(कुंडलियां):कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 
         -:मेरी सत्य घटना पर:-

उगे बीज पेड़ के

         मंच को सादर नमन  
                 *****
बार बार खीजकर, रोज रोज सींचकर,
उगे बीज पेड़ के, इनको संभालिए।।
मिली फसल पेड़ से, तोड़ तोड़ प्यार से,
पका पका लाड़ से, प्यार से तो खाइये।।
जोड़ जोड़ पाई पाई, हाड़ तोड़ की कमाई।
सूद मिला आज भाई, लाड़ तो दिखाइए।।
भरे हुए संस्कार से, शिक्षित परिवार से,
चरण पड़े प्यार से, प्रेम तो दिखाइए।।
बुजुर्ग मिलें गांव में,पीपल की छांव में,
बिछात नहीं खाट में, राम राम कीजिए।।
मिलत बात ज्ञान की, और कुछ ध्यान की,
बहुत कुछ समाज की, सिरो धार्य कीजिए।।
अपनी ही संतान को, और अपने मान को,
चरणों में आज रख, सर तो झुकाइए ।।
सम्मान दो बुजुर्ग को,आशीष मिले आपको,
खुशहाल हो जिंदगी, पांव तो पखारिए।।
                        ***
घनाक्षरी छंद :-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी

दो शब्दों का गीत


           दो शब्दों का गीत  
                       ***
कवियों का अर्चन करूं, शब्द सुमन ले हाथ।
सबको मैं वंदन करूं, और नवांऊ माथ ।।
और नवांऊ माथ, धुरंधर तुम्हें गुरुजी ।
देना तुम आशीष, करूं मैं छंद शुरू जी।।
दो शब्दों का गीत, गाते करूं मैं नर्तन।
देना मुझको ज्ञान, करूं कवियों का अर्चन।।
                      ****
कवियों का अर्चन करूं, शब्द सुमन ले हाथ।
सबको मैं वंदन करूं, और नवांऊ माथ ।।
और नवांऊ माथ, धुरंधर तुम्हें गुरुजी ।
देना तुम आशीष, करूं मैं छंद शुरू जी।।
दो शब्दों का गीत, गाते करूं मैं नर्तन।
देना मुझको ज्ञान, करूं कवियों का अर्चन।।
                      ****
  कुंडलियां:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 



छोटे कृषक

                 छोटे कृषक
                  *****
डरी-डरी सी वो आंखें, सहमें सहमें लोग।
खड़ा कृषक दरबार में, कैसा है संजोग।।
आज किसान मांग रहा, खेतों को जो खाद।
दिनभर लगा कतार में,भूख रही ना याद।।
हरी भरी फसलें नहीं, बिजली मिले न रोज।
उचित दाम मिलता नहीं, खोता अपना भोज।।
कृषक छोटे दीन रहे, बड़े कमाते माल।
डरें सदा हड़ताल से, फिर भी उधड़े खाल।।
                *****
दोहे:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 


बिन पेंदी के लोटा

         ““““बिन पेंदी के लोटा””””
             ताटंक छंद में प्रस्तुत है:-
                   ******
मौका मिलते पाला बदले,दल बदलू कहलाते हैं।
आन-बान को रखें ताक पर,सदा पांव सहलाते हैं ।
लाज नहीं इनको है आती,बिन पेंदी के लोटा जो…..
बीच सभा में जबरन घुसते,और बहुत इठलाते हैं।।
ठोंक सलामी काम निकालें, मौके पर चौंका देते।
इधर उधर की चुगली करके, अपनी जगह बना लेते।
नहीं मायका और सासरा,जेब सभी का भरते है….
बिन पेंदी के लोटे को, भाव नहीं कोई देते।।
                     ****
ताटंक छंद:-कमलेश नागवंशी, बनखेड़ी 


बाबा कहे जहान

                       सरसी छंद
                       *******
नहीं चाहिए नाम किसी से, नहीं चाहिए दान।
मुझको तो आजादी दे दो, नहीं चाहिए मान।
है काबिलियत इतनी मुझमें, बदलूंगा तकदीर।
देश हमारा अपना है ये, बदलूंगा तस्वीर।
मां से पाया नाम भीम तो, बाबा कहे जहान।
पढ़ने में अब्बल रहते थे,तभी मिली पहचान।।
स्कालर भी मिलती थी उनको,ग्यारह डालर माह।
अनेक बिषयों के शोध किए,और वकीली चाह।।
कदम बढ़ाया राजनीति में,ले लेबर को संग।
विजय हुआ तब इनका दल तो, हुए लोग थे दंग।
कानून मंत्री बने देश के, और लिखा विधान।
अंत किया है छुआ छूत का,सब हैं एक समान।।
भारत रत्न मिला है उनको, बहुत बड़ा ये मान।
जो कहते थे वो करते थे, ऐसे हुए महान।।
बुद्ध जैसी बुद्धि भी पाई, किया नहीं गुमान।
आज अमर है लेखन उनका, जाने सकल जहान।
    सरसी छंदः- कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी

दादा की पनही

          मंच को सादर नमन  
                      (1)
मैंने जबसे उनको देखा,पांव  मोजड़ी  बाबा के।
तेल पुती चमड़े की होती, पांव नरम थे बाबा के।
मेरे पैर बिना जूतों के, कंधों पर मुझे चढ़ाते…
कहां मिले आनंद कार में, जितना बाबा कंधों के।
                       (2)
याद पुरानी आती है अब, रोज पन्हैयां खाते थे।
पहन उन्हीं को बड़ी शान से, रोज घसीटा करते थे।
चर्र चर्र आवाजें करती, हमको बहुत सुहाती थी…
बाटा, लिबर्टी पता नहीं था,घर पर मोची सिलते थे।
                         *****
      मौलिक:- कमलेश नागवंशी


चले न कोई जोर

                  लावनी सादर प्रस्तुत 
                           ***
चले न कोई जोर हमारा,खुद अपनी ही बीवी पर।
दास बने से रह जाते हैं, क्रोध करें हम टीवी पर।

जबसे आई ज्वाला देवी,हक नहीं अधिकारों पर…
बड़ी शान से गये व्याहने, रहा भरोसा नीवी पर ।।
                           ***
                    कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी

कर दो बंद खदान